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“जाति की ज़ंजीरें — इस्लाम का इंसाफ़ और बराबरी”

Non Muslim · 3 - 6

कुछ समाजों में इंसान जन्म से ही “ऊँच-नीच” की मुहर लेकर जीता है—जैसे धर्म को ही ज़ुल्म का आधार बना दिया गया हो। यह वीडियो उसी अँधेरे से निकलकर इस्लाम के उस संदेश तक ले जाता है जो इंसान को इंसान मानता है: “सब एक ही रब के बंदे हैं, और इज़्ज़त का मापदंड केवल तक़वा है।” एक प्रभावशाली यात्रा: अँधेरा → नूर | भेदभाव → इंसाफ़ | गुलामी → आज़ादी.